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मनन का शांत समय (QUIET TIME)

यीशु को ग्रहण करने के बाद हमारे जीवन में परिवर्तन आने लगता है। परमेश्वर को जानने कि जिज्ञासा बढ़ जाती है। इस कारण हम परमेश्वर का वचन पढ़ते हैं। हम में से अधिकांश लोग बाइबल पढ़ते तो हैं लेकिन ठीक से समझ नहीं पाते हैं। इसीलिए हम आपको सिखाना चाहते हैं एक ऐसा विधि जिस का इस्तेमाल करने पर आप को बहुत लाभ होगा। आप वचन को पहले से ज्यादा समझने और परमेश्वर को अधिक जानने लगेंगे। साथ ही हम आपको सिखाएंगे कि किस तरह परमेश्वर का वचन को अपने जीवन में लागू करने के लिए मनन करे जिससे जीवन का हर क्षेत्र में परिवर्तन आए। परमेश्वर का वचन को हर दिन पढ़ने और मनन करने का विधि को हम “मनन का शांत समय” (QUIET TIME) कहते हैं।

क्या है “मनन का शांत समय” ?

यह हर दिन का एक खास समय है जब हम वचन का अध्ययन और प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के साथ अकेले में संगति करते हैं। हम परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत समय बिताते हैं। क्या आपको पता है? जब पुराने दिनों में बाइबल नहीं था तब भी परमेश्वर का दास अब्राहम और इसहाक अकेले में परमेश्वर के साथ समय बिताते थे। “भोर को उठ कर अब्राहम उस स्थान को गया, जहां वह यहोवा के सामने खड़ा था;” (उत्पति 19:27)। “साँझ के समय वह (इसहाक) मैदान में ध्यान करने के लिए निकला था; (उत्पति 24:63)। यीशु मसीह भी कभी भोर को तो कभी रात में अकेले परमेश्वर के साथ समय बिताता था। (मरकुस 1:35; लुका 6:12) दोस्तों! परमेश्वर हमसे प्यार करता है और वह हमारे साथ व्यक्तिगत रूप से समय बिताना चाहता है। क्या आप उसके साथ समय व्यतीत करना चाहते हो?

“मनन का शांत समय” का क्या महत्व है?

  1. जिस तरह हमलोग को स्वस्थ और ताकतवर रहने के लिए भोजन की जरूरत है उसी तरह हमें आत्मिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए आत्मिक भोजन की जरूरत है। वचन बताता है “नए जन्मे हुए बच्चों के समान निर्मल आत्मिक दूध की लालसा किया करो…” (1 पतरस 2:2)।
  2. परमेश्वर को और अधिक जानने के लिए “मनन का शांत समय” बहुत जरूरी है।
  3. जैसे-जैसे हम परमेश्वर को अधिक जानने लगेंगे वैसे-वैसे हमारा संबंध परमेश्वर के साथ और अधिक गहरा होता जाएगा।
  4. जब हम वचन को समझते और उसकी शिक्षा को जीवन में लागू करते हैं तब हम पाप से दूर रहते हैं। जैसा कि लिखा है – “जवान अपने चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से। मैंने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है कि तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।“ (भजन संहिता 199:9,11)
  5. जब हम जीवन के ऐसे पड़ाव में होते हैं जहां हमें सावधानीपूर्वक महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता है तब परमेश्वर अपनी योजनाओं को “मनन का शांत समय” के दौरान बताता है। वह हम से बात करता है।

यह कब करना चाहिए ?

बाइबल में परमेश्वर के दास और प्रभु यीशु मसीह भी कभी सुबह तो कभी रात को अकेले में परमेश्वर के साथ समय बिताते थे। इसका मतलब यह है कि हमें दिन में एक बार जब भी अच्छा और एकांत अनुकूल समय मिले तब “मनन का शांत समय” कर सकते हैं। लेकिन यह बहुत ही अच्छा होगा अगर हम कोई एक समय और स्थान प्रभु से मिलने के लिए निर्धारित करे।

इसके लिए हमें क्या-क्या चीज़े चाहिए ?

इसके लिए हमें केवल तीन चीज़े चाहिए- अपनी भाषा में बाइबल, लिखने के लिए कलम और कोई डायरी या कॉपी। हम जो कुछ भी सीखेंगे उसको लिखना चाहिए। आगे चल कर यही नोट्स हमारे लिए आत्मिक उन्नति और दूसरों को सिखाने का अच्छा संसाधन बन जाएगा।

“मनन का शांत समय” करने का क्रम

  1. सबसे पहले हमें खुद को तरो-ताज़ा करना चाहिए। अगर हम सो कर उठे हो तो मुंह-हाथ जरूर धोना चाहिए अथवा चाय पीना चाहिए। ऐसा करने से हमें बाइबल पढ़ते समय नींद नहीं आएगा।
  2. अब अपने मन को शांत करें। इधर उधर की बातें मत सोचे। गहरी सांस अंदर ले और धीरे-धीरे बाहर छोड़े। मन को इधर उधर व्यर्थ भटकने से रोके।
  3. अब प्रार्थना करे- “हे प्रभु आज मुझ से बातें करें। मैं आपके चरणों में आया हूँ। अपने वचनों के द्वारा मुझे सिखाए कि किस तरह मुझे जीवन जीना चाहिए।“
  4. आशावान रहें। ऐसा विश्वास रखें कि परमेश्वर आप से प्रेम रखता है। इस बात कि आशा करें कि परमेश्वर आप से बात करेगा और सिखाएगा।
  5. सब से पहले हमें बाइबल में से कोई एक पुस्तक चुनना है। फिर उसे आरंभ से पढ़ना शुरू करना चाहिए। हम चाहे तो एक अनुच्छेद या एक घटना तक पढ़ सकते हैं। एक अनुच्छेद में कम से कम पाँच वचन या अधिक से अधिक पंद्रह वचन हो सकते हैं। याद रखें- अधिक मात्रा से उत्तम गुणवत्ता होता है।
  6. पढ़ने के बाद हमें इस बताए गए विधि (APECST) के अनुसार कुछ सवालों का जबाब पढ़े गए अनुच्छेद में खोजना चाहिए। जिन सवालों का जबाब मिले उसको अपने नोटबुक या कॉपी में लिख लेना चाहिए।
  7. अंत में लिखे गए नोट्स के अनुसार हमें प्रार्थना करना चाहिए। साथ ही हम अपने सामान्य निवेदनों के लिए भी प्रार्थना कर सकते हैं।

पढ़ने के बाद किन सवालों को पूछे ? (APECST) विधि क्या है ?

दोस्तों! यह एक ऐसा विधि है जिससे हमें परमेश्वर के वचन को समझने में सहायता मिलती है तथा हम परमेश्वर को और अधिक जान पाते है। इस विधि को ASPECT, Quiet Time with God इत्यादि के नाम से भी जाना जाता है। तो आइये हम यह विधि सीखेंगे।

About God (A)- इस अनुच्छेद में परमेश्वर के चरित्र के बारे में क्या लिखा है?

परमेश्वर का गुण जैसे- परमेश्वर प्रेम करता है या परमेश्वर न्यायी है इत्यादि। अगर परमेश्वर के बारे में हमें कुछ मालूम होता है तो उन बातों को लिख लेना चाहिए।

Promise to claim (P)– क्या इस अनुच्छेद में परमेश्वर मुझ से कोई प्रतिज्ञा कर रहा है जिसे मुझे दावा करना करना है?

ज्यादातर परमेश्वर का प्रतिज्ञा किसी शर्त के साथ होता है। जैसे – “यदि तुम मुझ में बने रहो और मेरा वचन तुम में बना रहे तो जो चाहो मांगों और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।“ (यूहन्ना 15:7) अगर पढ़े गए अनुच्छेद में परमेश्वर का कोई प्रतिज्ञा मिले तो उसे लिख लेना चाहिए।

Example to follow (E)- क्या इस अनुच्छेद में कोई अच्छा उदाहरण है जिसका मुझे अनुसरण करना है अथवा कोई बुरा उदाहरण है जिसका मुझे अनुसरण नहीं करना हैं?

उदाहरण अच्छा और बुरा दोनों होता है। कभी कभी किसी व्यक्ति का जीवन से अथवा कोई दृष्टांत या चीजों का उदाहरण से परमेश्वर हमें सिखाता है। जैसे- पौलूस का जीवन से अच्छा उदाहरण… या दाखलता का पौधा से कोई उदाहरण। अच्छे उदाहरण को जीवन में लागू करे और बुरे उदाहरण को जीवन में लागू मत करे।

Command to obey (C)- क्या यहाँ परमेश्वर मुझे कोई आज्ञा दे रहा है?

परमेश्वर हमें कुछ करने के लिए आज्ञा देता है। जैसे- “अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो।“ “दाखरस से मतवाले मत बनो” इत्यादि। अगर पढ़े गए अनुच्छेद में हमें परमेश्वर का कोई आज्ञा मिलता है तो उसे लिख लेना चाहिए।

Sin to confess (S)- क्या यहाँ किसी पाप का जिक्र है जिसे मुझे अंगीकार कर के माफी मांगना है?

पाप दो तरह से हो सकता है-

(अ) जिस काम को परमेश्वर ने करने के लिए कहा है- उसे नहीं करना पाप है।

(ब) जिस काम को करने के लिए परमेश्वर ने मना किया है- उसे करना पाप है।

अब हमें परमेश्वर का चरित्र, बताया गया उदाहरण और परमेश्वर का आज्ञा के प्रकाश में खुद को रख कर मूल्यांकन करना चाहिए। क्या परमेश्वर का चरित्र के अनुसार मेरा चरित्र है? अगर मेरा चरित्र वैसा नहीं है तो यह मेरे लिए पाप है। जो सही उदाहरण दिया गया है क्या उसके अनुसार मैं करता हूँ? अगर मैं नहीं करता हूँ तो यह मेरे लिए पाप है। अगर बताया गया बुरा उदाहरण के अनुसार मैं करता हूँ तब भी मेरे लिए यह पाप है। क्या परमेश्वर के आज्ञा के अनुसार मैं कर रहा हूँ? अगर नहीं कर रहा हूँ तो यह मेरे लिए पाप है। जो भी पाप पवित्रात्मा दिखाए उसे अपने नोट्स में लिख लेना चाहिए। बाद में उन पापों को मानकर परमेश्वर पिता से माफी मांगना चाहिए।

Teachings or New Thoughts (T)- क्या आज मैंने कुछ नया सीखा अथवा क्या आज मुझे कोई नया विचार मिला?

यह हरेक के लिए अलग अलग होता है। अगर आप कुछ नया सीखे हो या कोई नया विचार मिला हो तो आप उसको जरूर लिख ले। कभी कभी पढ़ते समय कोई सवाल मन में उठता है। ऐसे में आप उन सवालों को भी लिख सकते हो।

APECST विधि के अनुसार

किस प्रकार नोट्स लिखना चाहिए?

नोट्स लिखने का तरीका (लुका 18:1-8)

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