The Indian Jim Elliot

भारतीय जिम एलीयट

क्या आपको एक हैरान करने वाली बात पता है? एक 26 वर्षीय भारतीय युवक से 290 गाँव के लोग आशीषित हुए। उसके मृत्यु के बाद 150 से अधिक लोगों ने अपना जीवन पूर्णकालिक सेवकाई के लिए समर्पित जब उन्होंने इस नवयुवक की बलिदानात्मक जीवनी सुना।  इसके वजह से EFICOR और FMPB दोनों संस्थाओं के बीच पार्ट्नर्शिप की शुरुवात हुई। इस हंसमुख लड़का का नाम से EFICOR संस्था ने एक अवॉर्ड – बेहतर सेवकाई करने वालों को उत्साहित करने के उदेश्य से शुरुवात की। इसने कुछ ऐसा किया कि EHA उसके नाम से एक अस्पताल खोलने के बारे में सोचने लगी। इसने हीरो बनने के लिए ये सब नहीं किया लेकिन उसका सरल और सेवा भाव से भरा जीवन दूसरों को बहुत प्रभावित किया।

तो दोस्तों, आइए हम जानते हैं एक ऐसे नवयुवक के बारे में जो दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। जिसके बारे में मैंने एक पुस्तक भी लिखा है – The Indian Jim Elliot. यह जीवनी पुस्तक UESI संस्था द्वारा जुलाई 2025 में प्रकाशित हुआ।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

कोएलपट्टी शहर, तमिलनाडु  में एक मसीही परिवार रहता था। हर दिन उत्तर भारत में सेवकाई बढ़ने के लिए प्रार्थना करने वाला परिवार। उन दिनों परिवार का मुखिया भाई पैट्रिक जोशुआ LIC में डिवीजनल मैनेजर के रूप में नौकरी करते थे और माता सुशीला बच्चों को संभालती थी। ऐसे परिवार में एक बच्चा का जन्म 23 मार्च 1967 में हुआ। उन्होंने इस बालक का नाम अमेरिका का शहीद मिशनरी जिम एलीयट के नाम पर – जिम एलीयट रखा।

1977 में, पिता पैट्रिक जोशुआ ने LIC की अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी को छोड़ कर पूर्णकालिक रूप से सेवकाई करने लगे। उस समय जिम की उम्र लगभग 10 वर्ष होगा। वे FMPB के जेनरल सेकेटरी (General Secretary) के रूप में काफी वर्षों तक अपना महत्वपूर्ण योगदान दिए। जिम ने त्याग और सरल जीवन को बचपन से ही अनुभव किया।

शिक्षा दीक्षा

जिम ने अपनी पढ़ाई लिखाई तमिलनाडु से की। उसने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से अपना ग्रेजुएशन किया। वह हंसमुख लड़का था। अपना चुटकुला और कॉमेडी से सबको हँसाने वाला। लेकिन कॉलेज के दिनों में वह बुरी संगति में फँस गया। कई तरह का गलत आदतों के वजह से उसका रिश्ता परमेश्वर के साथ और भी खराब होता गया। उसको डिप्रेशन हो गया। उसके सभी दोस्तों ने कोशिश कर के देख लिया और हार मान गए। बहुतों ने उसे छोड़ दिया लेकिन उसके पिता पैट्रिक जोशुआ ने अब तक हार नहीं माने थे। वह लगातार अपने बेटा जिम के लिए प्रार्थना किया करते थे। फिर जिम धीरे धीरे डिप्रेशन से बाहर निकला। बाद में उसने मास्टर इन सोशल वर्क (MSW) की भी पढ़ाई की।

उद्धार और बुलाहट

1980 में FMPB का वार्षिक सम्मेलन दानिशपेट, तमिलनाडु में हुआ। उस सम्मेलन में जिम ने यीशु को अपना उद्धारकर्ता और प्रभु के रूप में स्वीकार किया। उस समय उसकी उम्र 13 वर्ष थी। प्रभु को ग्रहण करने के बाद जीवन में काफी उतार – चढ़ाव आए।  1991 में वह कम्यूनिटी डेवलपमेंट ऑर्गनाइज़र (CDO) का ट्रैनिंग करने के लिए दिल्ली गया। EFICOR का इस कार्यक्रम के दौरान उसका जीवन में काफी बदलाव आया। उसने परमेश्वर का सम्पूर्ण मिशन को समझा। उसने त्यागपूर्ण सेवा का अर्थ समझा और अपना जीवन पूर्णकालिक सेवकाई के लिए समर्पित किया। पिता ने भी उसका जीवन में हुए परिवर्तन को देखा।

सेवकाई

EFICOR संस्था के द्वारा प्रशिक्षण (CDO) पाने के बाद उसने सेवकाई आरंभ किया। 1992 में उत्तरकाशी में भूकंप आया। EFICOR के टीम के साथ जिम भी उत्तरकाशी गया। वहाँ उसने भूकंप पीड़ितों के बीच सेवा किया। हिन्दी भाषा उसे समझ में नहीं आती थी लेकिन फिर भी लोग उसका हंसमुख चेहरा देख कर खुश हो जाते थे। उसे पहली तनख्वाह मिली। उसने उसमें से दसवांश निकाल कर पोस्ट ऑफिस से मनी ऑर्डर भेजा।

उत्तरकाशी से जिम को बिहार का माल्टो और संथाली जन-जातियों के बीच सेवा करने के लिए भेजा गया। वहाँ उसे 6 महीना काम करने के बाद गुजरात भजेने का योजना था। उन दिनों काला-ज्वार और मलेरिया एक महामारी कि तरह फ़ैला हुआ था। पहाड़ी क्षेत्र में कोई सड़क नहीं था। अच्छी स्वस्थ व्यवस्था कि कमी के कारण लोग मर रहे थे। साहेबगंज बरहरवा क्षेत्र में मौत का दहशत था। लोग परेशान थे। जिम ने केवल साढ़े पाँच महीने में ही 290 गाँव में DDT  का छिड़का बहुत तेजी के साथ किया। वहाँ के लोगों के साथ समय बिताया और उनका सेवा किया।

मृत्यु

लेकिन उसको भी अंत में ब्रेन मलेरिया हो गया। महज 26 वर्ष उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। उसने जो कुछ बोया वह फलवंत हुआ और आज भी वहाँ सेवकाई बढ़ रहा है।

The Indian Jim Elliot – Biography

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